राजस्थान की हस्तकलाएँ MCQ (Handicrafts of Rajasthan) – Part 6
इस पोस्ट में राजस्थान की कला एवं संस्कृति के टॉपिक राजस्थान की हस्तकलाएँ से संबंधित Latest व पूर्णतः updated महत्वपूर्ण MCQ प्रश्न दिए गए हैं।
इन प्रश्नों में मिरर वर्क, लहरिया व पोमचा, लोहे के औजार, पोकरण पॉटरी, ब्ल्यू पॉटरी, चंदन की काष्ठकला, हैंडलूम डिज़ाइन, सुनहरी टेराकोटा, हाथी दांत के कार्य, मटके व सुराही आदि से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारियों को व्याख्या सहित शामिल किया गया है।
ये MCQ प्रश्न RPSC, RSMSSB, RSSB, RAS, Patwar, Police SI & Constable, LDC, VDO, Agriculture Supervisor, Fireman, Woman Superwiser, REET, Teacher, वनपाल, वनरक्षक तथा राजस्थान राज्य की अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी हैं।
- Subject: राजस्थान की कला एवं संस्कृति
- Topic: राजस्थान की हस्तकलाएँ
- कुल प्रश्न: 20
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(Since 2021)
101. लहरिया व पोमचा के लिए जाना जाता है-
- (A) जयपुर
- (B) बाड़मेर
- (C) बीकानेर
- (D) उदयपुर
लहरिया और पोमचा के लिए जयपुर प्रसिद्ध है। लहरिया में कपड़े को मोड़कर उस पर तिरछी धारियों वाली रंगाई की जाती है, जिससे लहरों जैसा सुंदर डिज़ाइन बनता है। पोमचा एक विशेष प्रकार का दुपट्टा होता है जिसे मांगलिक अवसरों पर महिलाएँ पहनती हैं। यह कला राजस्थान की रंगाई और छपाई परंपरा की प्रमुख पहचान है।
102. राजस्थान में लोहे के औजार कहाँ के प्रसिद्ध हैं-
- (A) अलवर
- (B) जयपुर
- (C) नागौर
- (D) जोधपुर
नागौर में बने लोहे के औजार पूरे राजस्थान में प्रसिद्ध हैं। इसी कारण नागौर को 'राजस्थान की धातु नगरी' कहा जाता है। यहाँ पारंपरिक रूप से खेती-बाड़ी और घरेलू उपयोग के औजार बनाए जाते हैं। नागौर की लोहार शिल्पकला आज भी गाँवों में प्रचलित है।
103. वर्ष 2018 में राजस्थान की किस पॉटरी कला को जियोग्राफिक इंडिकेशन (GI) मिला है?
- (A) ब्ल्यू पॉटरी
- (B) पोकरण पॉटरी
- (C) अलवर पॉटरी
- (D) मोलेला क्ले वर्क
वर्ष 2018 में पोकरण पॉटरी को जियोग्राफिक इंडिकेशन (GI) प्राप्त हुआ। यह पॉटरी विशेष प्रकार की मिट्टी से बनाई जाती है, जिससे बने बर्तन पानी को ठंडा रखने और लंबे समय तक सुरक्षित रखने में सहायक होते हैं। पोकरण (जैसलमेर) की यह कला राजस्थान की पारंपरिक पहचान है।
104. जस्ते की मूर्तियाँ व वस्तुएँ मुख्यतः कहाँ बनती हैं?
- (A) जयपुर
- (B) जैसलमेर
- (C) जोधपुर
- (D) गलियाकोट (डूंगरपुर)
जोधपुर जस्ते की मूर्तियों और वस्तुओं के निर्माण के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ कारीगर जस्ते से सुंदर मूर्तियाँ और सजावटी सामान तैयार करते हैं। यह शिल्प जोधपुर की विशिष्ट कला परंपरा है और इसे बाजार में विशेष मांग रहती है।
105. राजस्थान में मूर्तिकला के लिए कौनसा शहर विख्यात है-
- (A) जयपुर
- (B) कोटा
- (C) भरतपुर
- (D) अलवर
राजस्थान में मूर्तिकला के लिए सबसे अधिक विख्यात शहर जयपुर है। यहाँ संगमरमर और अन्य पत्थरों पर सुंदर मूर्तियाँ बनाई जाती हैं। इसके अलावा थानागाजी (अलवर), सिकंदरा (दौसा), किशोरी गाँव (अलवर), जोधपुर और गलियाकोट (डूंगरपुर) भी मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध हैं। लेकिन जयपुर का स्थान सर्वोपरि है।
106. ब्ल्यू पॉटरी का तात्पर्य है-
- (A) चांदी के आभूषणों पर नीले रंग की मीनाकारी
- (B) नीले काँच पर स्वर्णिम चित्रांकन
- (C) चीनी मिट्टी के बर्तनों पर नीले रंग की चित्रकारी
- (D) इनमें से कोई नहीं
ब्ल्यू पॉटरी का तात्पर्य है चीनी मिट्टी के बर्तनों पर नीले रंग की चित्रकारी। यह कला जयपुर की विशेष पहचान है। इसमें क्वार्ट्ज और अन्य पदार्थों से बर्तन बनाए जाते हैं और उन पर नीले-हरे रंग की आकृतियाँ सजाई जाती हैं। ब्ल्यू पॉटरी को विश्वस्तर पर पहचान मिली है।
107. चंदन की काष्ठकला के लिए प्रसिद्ध शहर है?
- (A) बीकानेर
- (B) जयपुर
- (C) चुरू
- (D) भरतपुर
चुरू शहर चंदन की काष्ठकला के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ चंदन की लकड़ी पर बारीक नक्काशी करके धार्मिक और सजावटी वस्तुएँ बनाई जाती हैं। चुरू के चौथमल जांगिड़, मालचन्द, महेश जांगिड़ और उमेशचन्द्र को इस कला के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।
108. हैण्डलूम डिजाईन डवलपमेंट एण्ड ट्रेनिंग सेंटर' कहाँ पर स्थित है-
- (A) नागौर
- (B) उदयपुर
- (C) बीकानेर
- (D) चित्तौड़गढ़
राजस्थान का हैंडलूम डिज़ाइन डवलपमेंट एंड ट्रेनिंग सेंटर नागौर में स्थित है। यहाँ बुनकरों और कारीगरों को पारंपरिक वस्त्र कला के साथ आधुनिक डिज़ाइन और तकनीक का प्रशिक्षण दिया जाता है। यह केंद्र स्थानीय उद्योग और हस्तकला को प्रोत्साहन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
109. बेवाण कहाँ के प्रसिद्ध है-
- (A) आकोला
- (B) बस्सी
- (C) नाथद्वारा
- (D) सांगानेर
बेवाण बस्सी (चित्तौड़गढ़) के प्रसिद्ध हैं। यह लकड़ी से बनी एक धार्मिक कलाकृति है, जिसमें देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ बनाकर पूजा-अर्चना की जाती है। बस्सी गाँव काष्ठकला और कावड़ निर्माण के लिए भी प्रसिद्ध है।
110. बाड़मेर का चौहटन कस्बा निम्न में से किस कला के लिए प्रसिद्ध है?
- (A) मिरर वर्क
- (B) सुनहरी टेराकोटा
- (C) हाथी दांत के कार्य
- (D) मटके व सुराही
बाड़मेर का चौहटन कस्बा मिरर वर्क के लिए प्रसिद्ध है। इसमें काँच के छोटे-छोटे टुकड़ों को कपड़े पर रखकर चारों ओर सुई और रेशमी धागे से कढ़ाई की जाती है, ताकि काँच मजबूती से कपड़े में जड़ा रहे। यह कला बाड़मेर की परंपरागत महिलाओं की कढ़ाई और सृजनशीलता का प्रतीक है।
111. हस्तशिल्प उद्योग को संरक्षण देने वाले संस्थान राजसीको का मुख्यालय कहाँ स्थित है-
- (A) जोधपुर
- (B) उदयपुर
- (C) जयपुर
- (D) अलवर
राजस्थान में हस्तशिल्प उद्योग को संरक्षण देने वाला प्रमुख संस्थान राजसीको (राजस्थान लघु उद्योग निगम) है। इसका मुख्यालय जयपुर में स्थित है। यह संस्था 1961 में स्थापित की गई थी और इसका उद्देश्य राज्य की हस्तकलाओं और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करना तथा उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार उपलब्ध कराना है।
112. उस्ता कला का वह कलाकार, जिसने ख्वाजा साहब की दरगाह (अजमेर) में स्वर्णिम नक्काशी का कार्य किया है?
- (A) कादर बख्श उस्ता
- (B) मोहम्मद हनीफ उस्ता
- (C) हिसामुद्दीन उस्ता
- (D) इलाही बख्श उस्ता
मोहम्मद हनीफ उस्ता वह प्रसिद्ध कलाकार थे, जिन्होंने अजमेर स्थित ख्वाजा साहब की दरगाह में स्वर्णिम नक्काशी का कार्य किया। उस्ता कला ऊँट की खाल पर स्वर्णिम चित्रकारी और सजावट की अनूठी शैली है, जो बीकानेर और अजमेर में विशेष रूप से प्रसिद्ध रही है।
113. मोठड़ा' वेशभूषा के कौनसे प्रकार के अन्तर्गत आता है-
- (A) घाघरा
- (B) कुर्ता
- (C) गोटे का प्रकार
- (D) ओढ़नी
राजस्थान की पारंपरिक वेशभूषा में मोठड़ा ओढ़नी का एक प्रकार है। यह महिलाओं द्वारा सिर और शरीर पर ओढ़ी जाने वाली विशेष ओढ़नी है, जिसमें पारंपरिक रंगाई और डिज़ाइन होते हैं। राजस्थान में प्रत्येक क्षेत्र की ओढ़नी का अपना अलग महत्व और नाम है, उन्हीं में से एक आहे "मोठड़ा"।
114. निम्न में से कौनसा युग्म (नाम – उत्पाद – प्रसिद्ध स्थान) सही सुमेलित नहीं है?
- (A) घेवर – जोधपुर
- (B) रसगुल्ला – बीकानेर
- (C) मावा कचौरी – जोधपुर
- (D) कलाकन्द – अलवर
घेवर जयपुर का प्रसिद्ध है, न कि जोधपुर का। यह मिठाई सावन और तीज के अवसर पर विशेष रूप से बनाई जाती है। जबकि रसगुल्ला बीकानेर का, मावा कचौरी जोधपुर की और कलाकंद अलवर की विशेष पहचान हैं।
115. टोंक
- (A) 1234
- (B) 4321
- (C) 1243
- (D) 3412
सही सुमेल है – बादला (जोधपुर), नमदा (टोंक), पाव रजाई (जयपुर), खेसला (लेटा)। इसलिए सही क्रम 3412 है। यह विभिन्न स्थानों की प्रमुख हस्तकलाओं और वस्त्र परंपराओं को दर्शाता है।
116. कुमारप्पा हस्तशिल्प कागज राष्ट्रीय संस्थान' की स्थापना की गई है-
- (A) शाहपुरा
- (B) नाथद्वारा
- (C) सांगानेर
- (D) बोरूंदा
कुमारप्पा हस्तशिल्प कागज राष्ट्रीय संस्थान की स्थापना सांगानेर (जयपुर) में की गई है। यहाँ हाथ से कागज बनाने की पारंपरिक कला को बढ़ावा दिया जाता है। इस संस्थान का नाम अर्थशास्त्री और गाँधीवादी विचारक जे.सी. कुमारप्पा के नाम पर रखा गया है।
117. राजस्थान में लेटा, मांगरोल एवं सालावास जाने जाते हैं-
- (A) तीर कमान निर्माण के लिए
- (B) कोफ्तगिरी के लिए
- (C) कपड़े की मदों की बुनाई के लिए
- (D) कठपुतली कला के लिए
राजस्थान के लेटा, मांगरोल और सालावास कपड़े की मदों और दरियों की बुनाई के लिए प्रसिद्ध हैं। यहाँ के कारीगर ऊन और सूती धागों से टिकाऊ और कलात्मक दरियाँ तैयार करते हैं। इनका उपयोग विशेष रूप से ग्रामीण घरों में होता है।
118. लप्पा, लप्पी, किरण एवं बांकड़ी यह सब हैं-
- (A) पॉटरी के भिन्न-भिन्न प्रकार
- (B) फड़ के भिन्न-भिन्न प्रकार
- (C) उस्ता कला के भिन्न-भिन्न प्रकार
- (D) गोटे के भिन्न-भिन्न प्रकार
लप्पा, लप्पी, किरण और बांकड़ी गोटे के विभिन्न प्रकार हैं। गोटा राजस्थान की पारंपरिक कढ़ाई शैली है, जिसका प्रयोग दुपट्टों, ओढ़नियों और शादी-विवाह के परिधानों पर किया जाता है। इसके अन्य प्रकार हैं – गोखरू, नक्शी, बिजिया, चम्पाकली और लहरगोटा।
119. बिनोटा क्या है-
- (A) दूल्हा-दूल्हन के विवाह की जूतियाँ
- (B) दूल्हे की तलवार
- (C) लोक देवी-देवताओं को पूजने की रस्म
- (D) विवाह में गाये जाने वाले गाली गीत
बिनोटा राजस्थान की पारंपरिक विवाह जूतियाँ हैं, जिन्हें विशेष रूप से दूल्हा और दुल्हन विवाह के समय पहनते हैं। यह जूतियाँ सुंदर कढ़ाई और गोटे से सजाई जाती हैं। राजस्थान की शादी-विवाह परंपरा में इनका विशेष स्थान है।
120. गोबर के उपलों/कंडों को व्यवस्थित रूप से चुनाई कर उसे चारों ओर से गोबर से लीप दिया जाता है, ऐसे उपलों का ढेर क्या कहलाता है?
- (A) हीड़
- (B) बटेवड़ा
- (C) सोहरिया
- (D) गोड़लिया
गोबर के उपलों/कंडों को चुनाई कर एकत्रित करके बाहर से गोबर से लीपने पर बना ढेर सोहरिया कहलाता है। यह ग्रामीण जीवन की पारंपरिक व्यवस्था है, जिसमें उपलों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जाता है। इन्हें मुख्यतः ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है।
राजस्थान की हस्तकलाएँ MCQ – सभी भाग:
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